Jeevan prahar | Life poem - Poetrymyway

जीवन प्रहार

जीवन की शाम
ढलने को आई
रात देखो
कैसे गहराई
दिन का सूरज गुम सा गया
रात का चाँद तो मनभाया
कैसी है ये माया।

दिन के सफर से थक कर
रात में किया विश्राम
मुसीबतों से लड़ कर
लिखा विजय पताके पर नाम
कैसा यह विश्राम।

काम करने से दूर भागते
भूख लगे तो दौड़े आते
जल्दी से खाते गरम - गरम
नहीं आती उन्हें शरम
कैसा है यह मानव का धर्म।

दिन में खेलते छोटे बच्चे
कब सीखेंगे अपना कर्म
होते हैं वे मन के सच्चे
कब होगा ज्ञान का जन्म
कैसा यह जीवन का मर्म।  

                - Saket Singh

Popular posts from this blog

Difference between poem and poetry - a detailed view

Types of Poems and Their Characteristics : Exploring the Variety

Mystical Nights of Summer: Embracing the Enchantment in the Moonlit Sky