स्त्री जीवन - एक कविता

              sad girl-sad woman - a poetry.





स्त्री जीवन

बैठी वो धूप में
थी विचारों में मग्न
क्या ऐसा ही सोचा था
होगा एक स्त्री का जीवन ।

सोच रही थी बैठ कर
कुछ यादें भूली भूलि
देखे थे मैंने भी सपने 
आज है आंखे खुली हुई ।

विवाह के पहले का ससुराल
जिसको मन ने दिया आकार
आज आंखे ही है मेरी ताल
सारे मन के बिखरे तार।

ये आजादी है या बंधन
सब कहते परायी धन
मायेका में हूं मेहमान
ससुराल में सब से अनजान।

सर्वस्व छोड़ मै पति के पास
लगी केवल निराशा हाथ
जब बोलो बन जाऊं दास
पर तुम तो बनो मेरे नाथ।

जब दुनिया से बिसर कर
मेरे नैना पखारे पांव
प्रेम की पिया करना छांव
ये स्त्री मन चाहे इतना अक्सर।

                      - Saket Singh



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